अन्नदाता किसान


धरती माता को उर्वरा बनाने ,में इसका ही हाथ है ।

इस उर्वरा धरा से, सोना उगाने में इसका ही साथ है ।।

यह मात्र सामान्य किसान नहीं, सबका अन्नदाता है ।

इसके बदले में यह हलथर बहुत ही थोड़ा धन पाता है ।।

न धन्ना सेठों का ध्यान है, ना निर्दयी सरकार का ।

पर समझते हैं सब इसको ,आदमी है बहुत ही काम का ।।

शानो शौकत देख महलों की ,जो स्वयं कभी नहीं पिघलता।

स्वार्थी नेताओं के बहकावे में आ, कभी कबार यह बहकता।।

हमको चिंता है हमारे रंगीन चमकते महलों की

इसको तनिक भी ना चिंता है अपनी फटी कम्बलों की

इसके तपते खुले बदन से भीषण गर्मी भी शर्मा जाती है

हमें मखमली रजाई में दुबका देख सुर्ख सर्दी भी शर्मा जाती है

हमारा समय निकलता कूलर पंखे में बैठ राम नाम जपने से 

हलथर का समय गुजरता भरी दुपहरी खेत में नंगे बदन तपने से

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